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मधु कैटभ वध कथा

दुर्गा सप्तसती के प्रथम अध्याय में महर्षि मेधा ने राजा सुरथ को योगमाया की माया के प्रभाव से मधु कैतभ के वध की कथा सुनाई |

Madhu kaitabh died       कथा इस तरह है की एक बार

एक बार भगवान् विष्णु क्षीर सागर शेषशैया पर योगनिद्रा में थे । सम्पूर्ण संसार जल विलीन हो चूका था । तब मधु कैटभ नामक दो दैत्य श्री हरि के कर्ण के मैल से प्रकट हुए । वे बड़े बलशाली और भीमाकार थे | बाहर आते ही उनकी नजर ब्रह्मा जी पर पड़ी जो श्री विष्णु के नाभि कमल पर विराजमान थे । ब्रह्मा जी जानते थे कि इन दोनों महाबलवान दैत्यों से सिर्फ विष्णु जी ही मुझे बचा सकते हैं । उन्हें अपने प्राण बचाने के लिए गहरी निद्रा में योगमाया के प्रभाव में सोये हुए हरि को जगाना जरुरी था | इसके साथ साथ सम्पूर्ण जगत को चलाने वाली योगमाया की माया मधु कैतभ पर भी असर करवानी थी अत: उन्होंने मन ही मन विष्णु जी की आँखों में बसने वाली योगनिद्रा से प्रार्थना शुरू कर दी |

ब्रह्मा जी की विनती पर अव्यक्तजन्मा उनके समक्ष खड़ी हो गयी | इसी के साथ योगमाया के नेत्रों से आ जाने पर भगवान विष्णु शय्या से जग उठे | श्री हरि ने उनसे 5000 वर्षो से बाहूयुद्ध किया | तब महामाया ने मधु कैतभ को अपने योग माया में कैद कर लिया | इसी माया के प्रभाव से उन दोनों दानवो ने विष्णु से कोई भी वर मांगने की बात कही | भगवान विष्णु ने उनके प्राण मांग लिए | मधु कैतभ ने प्रभु से कहा की जिस जगह जल न हो वही हम्हारा वध करो | तब श्री हरि ने अपनी जाँघों पर लेकर उनका वध किया ।

इस तरह महामाया ने बिना युद्ध लिए सिर्फ अपनी माया से मधु कैतभ के वध होने में मुख्य भूमिका निभाई |


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महिषासुर वध     धूम्रलोचन वध

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